मोदी का ही उपहास क्यों?

1:30 pm or May 12, 2014
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सुनील अमर-

भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेन्द्र मोदी कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं जिन्हें उनकी पार्टी ने प्रधानमन्त्री पद का दावेदार घोषित कर चुनाव लड़ाया है। इससे पूर्व इसी पार्टी से श्री अटल बिहारी वाजपेयी और श्री लालकृष्ण आडवाणी भी तत्कालीन लोकसभा चुनावों में घोषित उम्मीदवार ही थे। इनसे भी पहले वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में काँग्रेस से विद्रोह करके जनमोर्चा,तदन्तर जनता दल का गठन करने वाले स्व. वी.पी. सिंह भी चुनाव लड़ते समय प्रधानमन्त्री पद के लिए दावेदार ही थे। उनसे भी पहले वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में श्री राजीव गाँधी भी प्रधानमन्त्री पद के दावेदार थे। उनसे पूर्व उनकी माँ और उनके नाना जवाहरलाल नेहरु भी अपने समय के चुनावों में प्रधानमन्त्री पद के दावेदार हुआ ही करते थे लेकिन इनमें से किसी का भी ऐसा उपहास नहीं उड़ाया गया जैसा कि श्री नरेन्द्र मोदी का।

यहाँ सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों है? मोदी राजनीति में कोई नौसिखुए नहीं हैं। वे पिछले 12-13 वर्षों से लगातार गुजरात के मुख्यमन्त्री हैं, इसलिए राजनीति और चुनाव लड़ना दोनों उनको आता है। बावजूद इन सबके, इस देश के मतदाताओं को प्रधानमन्त्री पद के लिए जिस तरह के गंभीर प्रत्याशियों को देखने की आदत रही है, श्री मोदी वह अपेक्षा पूरी नहीं करते। गैर भाजपाई दलों के प्रत्याशियों की बात छोड़ भी दें तो भाजपा में ही सर्वश्री बाजपेयी और आडवाणी का व्यक्तित्व और बोल-चाल विद्वतापूर्ण, गंभीर और शालीन है और श्री मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज जैसी नेताओं के व्यवहार भी देश के बाकी नेताओं के लिए स्पृहणीय हैं। पार्टी के नौजवान नेता शाहनवाज हुसैन भी अपने मर्यादित आचरण और संयत भाषा के लिए जाने जाते हैं। दूसरी तरफ श्री मोदी हैं जिन्होंने शुरुआत से ही अपनी बड़बोलेपन की छवि गढ़ ली है। यही कारण है कि सोनिया गाँधी की पुत्री प्रियंका गाँधी ने कहा है कि श्री मोदी के भाषणों में बचकानापन है। संभवत: मोदी के रणनीतिक सलाहकारों ने उन्हें बताया होगा कि हर स्तर पर आक्रामक होना उनके लिए फायदेमन्द होगा या हो सकता है कि इस तरह की आक्रामकता का लाभ उन्हें गुजरात के चुनावों में मिला रहा हो।  मोदी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की जुगलबंदी होते ही उसका असर राष्ट्रीय फलक पर दिखाई पड़ने लगा। पार्टी के मुम्बई अधिवेशन में भाजपा के संविधान में संक्षिप्त संशोधान करके श्री राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने का मार्ग प्रशस्त किया गया तो मोदी ने अपने एक धुर विरोधी नेता को पार्टी से निष्काषित कराने के बाद ही उस अधिवेशन में भाग लिया। यह मामला इतना असंवैधानिक था कि बैठक को बीच में ही छोड़कर श्री आडवाणी और श्रीमती सुषमा स्वराज चले गए। पार्टी के निष्ठावान नेताओं-कार्यकर्ताओं पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा लेकिन मोदी ने इसे अपनी सफलता माना और वे इसी राह पर चल पड़े। कालांतर में देश ने देखा कि बातचीत करने की अपनी मुठभेड़ शैली, अधाकचरा ज्ञान और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का उत्पीड़न मोदी चालित भाजपा की कार्यशैली बन गयी। मोदी संघ के पूर्णकालिक प्रचारक रहे हैं, इसलिए स्वाभाविक ही उनका अभ्यास है कि वे जो कहें उसे ही सही मानकर और सिर झुकाकर लोग स्वीकार करें। संघ में यही नियम चलता है। वहाँ प्रवेश करने वालों को अपना जूता और बुद्वि संघ के चौखट पर उतार कर ही भीतर प्रवेश मिलता है। वहाँ तर्क नहीं, आस्था चलती है। स्वाभाविक है कि श्री मोदी भी तर्क आदि से कोसों दूर हैं। यह चर्चा आम है कि न्यूज चैनलों में उनके हालिया साक्षात्कार के सवाल-जवाब पूर्वनिर्धारित थे। इसकी जानकारी होते ही साक्षात्कार लेने वाले न्यूज चैनल के एक वरिष्ठ पत्रकार ने उस चैनल की नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

बीते साल की बात है जब मोदी ने 15 अगस्त को पहले तो ऐतिहासिक लालकिले के नाम की नकल करते हुए गुजरात के लालकिला नामक स्थान पर स्थित एक विद्यालय से भाषण दिया और कहा कि उनका भाषण प्रधानमंत्री के भाषण से भी जोरदार होगा फिर कुछ समय पश्चात मध्यप्रदेश में लालकिले की नकल का एक मंच बनवाकर उससे भाषण दिया। देश में किसी राजनेता द्वारा इस तरह की गई यह पहली हरकत थी। यह मोदी के स्वभाव की झलक थी। देश के हर राजनेता का सपना होता है कि वह प्रधानमंत्री के तौर पर लालकिले से तिरंगा फहरा कर देश को सम्बोधित कर सके लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह लालकिले की अनुकृति बनवाकर अपना यह सपना पूरा करे! मोदी के प्रचार का यह आलम है कि दो माह पूर्व उन्होंने विकीलीक्स के नाम पर एक फर्जी प्रमाणपत्र बनवा लिया जिसमें कहा गया था कि ‘मोदी से अमेरिका डरता है क्योंकि मोदी ईमानदार हैं’ लेकिन यह विज्ञापन प्रचार में आते ही विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने बयान जारी किया कि विकीलीक्स ने ऐसा कभी नहीं कहा है। मोदी का एक ताजा बयान श्रीमती सोनिया गॉधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के बारे में है जो कि गुजरात से आते हैं, कि श्री पटेल उनके दोस्त हैं और मिलते रहते हैं। श्री पटेल ने दावा किया है कि अगर श्री मोदी इसे साबित कर दें कि उन दोनों की कभी मुलाकात भी हुई हो तो वे राजनीति छोड़ देंगें।

बीते 8-9 महीनों से भाजपा का चुनाव प्रचार जोरों पर है लेकिन कोई बताए कि क्या उसने इस बीच कभी श्री आडवाणी, जोशी, सुषमा स्वराज, यशवंत सिन्हा यहाँ तक कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी बोलते या अखबारों में छपते देखा? हर तरफ सिर्फ मोदी! चुनावों के समय तो जनता वैसे भी कुछ ज्यादा सजग रहती है, ऐसे में यह सवाल उठ रहे हैं कि भाजपा के बाकी बड़े नेता नेपथ्य में क्यों चले गए हैं। उत्तर प्रदेश का वाराणसी शहर, जहाँ से श्री मोदी चुनाव लड़ रहे हैं, वहाँ से भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरलीमनोहर जोशी सांसद हैं लेकिन उन्हें जबरन वहाँ से कानपुर संसदीय सीट पर भेजकर मोदी ने वह सीट कब्जा ली है। श्री जोशी ने भाजपा कार्यसमिति की दिल्ली बैठक में इसका जबर्दस्त विरोध किया लेकिन अधर्यक्ष राजनाथ ने उनकी सुनी नहीं। नतीजा यह हुआ है कि पूरे उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार कर रहे श्री नरेन्द्र मोदी श्री जोशी का प्रचार करने कानपुर नहीं गए!

श्री मोदी में तानाशाही प्रवृत्ति है जो उनके छिपाए भी नहीं छिपती। वे ऐसे झूठ बोलते हैं जो अगले ही दिन खुल जाते हैं। वे एक पल मुसलमानों को आश्वासन देने की कोशिश करते हैं लेकिन अगले ही पल धामकाने की स्वाभाविक मुद्रा में आ जाते हैं। वे देश से भ्रष्टाचार और कालाधन दूर करने की बात करते हैं और उसी भ्रष्टाचार से कमाए गए बेशुमार कालेधन से अपना चुनाव प्रचार कर रहे हैं। देश के संविधान और कानून के प्रति उनके मन में क्या सम्मान है इसकी एक ताज़ा बानगी ही पर्याप्त होगी कि गॉधीनगर, गुजरात में अपना वोट डालने के बाद उन्होंने वहाँ न सिर्फ पत्रकार वार्ता की बल्कि भाजपा का चुनाव चिन्ह कमल       का प्रदर्शन भी किया। यह चुनाव आयोग के नियमों-प्रतिबन्धों का सरेआम उल्लंघन है जिसके लिए उन पर मुकदमा भी दर्ज हो गया है। पत्रकारों द्वारा नियमों का हवाला देने पर श्री मोदी ने कहा कि उन्होंने कमल का फूल ही तो दिखाया है, कोई चाकू-पिस्टल तो नहीं। प्रधानमंत्री पद के किसी दावेदार से क्या हम ऐसे ही व्यवहार और प्रदर्शन की उम्मीद करते हैं? ऐसे आचरण वाले व्यक्ति से देश को किस दिशा निर्देशन की उम्मीद हो सकती है?

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