मोदी की राजनीति – कुछ खतरनाक पहलू

1:34 pm or May 12, 2014
120520143

अखिल विकल्प-

”लोग पता नहीं क्यों, मोदी जी के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं?” यह प्रश्न अक्सर मोदी जी के समर्थकों द्वारा उठाया जाता है। प्रश्न भी वाजिब है, बाकियों में भी कम-ज्यादा बुराइयां हैं तो मोदी ही क्यों? इस प्रश्न के उत्तर में मोदी की राजनीति के कुछ खास पहलू उजागर करने जरूरी हैं।

पहला है, स्वयं मोदी जी के व्यक्तित्व का महिमामण्डन कि उनके प्रधानमंत्री बन जाने से सारी समस्यायें हल हो जायेंगी। हमारे देश में आजादी के बाद से ही यह बहस थी कि भारत की शासन व्यवस्था कैसी होगी? स्वाधीनता संग्राम के गर्भ से निकली यह बहस इस निष्कर्ष पर पहुंची कि भारत में संसदीय जनतंत्र ही सर्वोत्तम है। क्या यह सम्भव है कि नरेन्द्र मोदी जी अकेले हिन्दुस्तान की 121 करोड़ जनता को समझ सकते हैं, उस हिन्दुस्तान में जहां विभिन्न संस्कृतियां, भाषायें आदि मौजूद हैं? क्या हम ये कल्पना कर सकते हैं कि जब भाजपा, शिवसेना मिलकर चुनाव लड़ेंगी तो क्या मात्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के कारण ही वहां हिन्दी भाषी के खिलाफ घृणित राजनीति खत्म हो जायेगी? क्या हम ये कल्पना कर सकते हें कि मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के कारण ही कर्नाटक में येदुरप्पा भ्रष्टाचार छोड़ देंगे? इस किस्म का, व्यक्ति का महिमामण्डन देश को किस ओर ले जायेगा? यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हमें उसी सवाल से जूझना पड़ रहा है जिससे आज से 80 साल से भी पहले, शहीद भगतसिंह, जूझ रहे थे जब उन्होंने कहा था ”यदि भारत सरकार का प्रमुख लॉर्ड रीडिंग की जगह पुरूषोत्तमदास ठाकुर हों तो उन्हें (जनता को) इससे क्या फर्क पड़ता है? एक किसान को इससे क्या फर्क पड़ता है कि लॉर्ड इरविन की जगह सर तेज बहादुर सप्रू आ जायें।”

दूसरा खतरनाक पहलू है गुजरात मॉडल। पहला प्रश्न तो ये है कि भारत जैसे विविधता जैसे देश में क्या किसी प्रदेश का ”मॉडल” लागू भी हो सकता है या नहीं। फिर दूसरा बड़ा प्रश्न है क्या गुजरात मॉडल, वाकई एक मॉडल है। एक बार मान भी लिया जाये कि गुजरात में विकास, जो भी मोदी जी की नजर में विकास है, वो हुआ, तो भी क्या वहां कुछ भी गड़बड़ नहीं है? क्या वहां सब अच्छा-अच्छा चल है? वहां कुछ भी सुधारने योग्य नहीं? अब ये माने तो वहां सबको शिक्षा, सबको काम, सबको स्वास्थ्य तो होगा ही होगा। या फिर वहां की जो स्थिति है, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार 3 में से एक बच्चा कुपोषण तथा आधी से अधिक महिलायें खून की कमी की शिकार हैं, स्कूल छोड़ने की दर (ड्रॉप आउट रेट) राष्ट्रीय दर से अधिक तथा न्यूनतम मजदूरी राष्ट्रीय औसत से कम है, इसे अच्छा मान जाये? वो भी तब जब वहां कारपोरेट घरानों को तमाम छूट दी गयी हैं। हर राज्य की यहां तक कि देशों की भी अपनी अपनी खूबियां और कमजोरियां हैं, पर गुजरात मॉडल का ऐसा महिमा मण्डन खतरनाक है, क्योंकि कमजोरियों को सुधारा तभी जा सकता है जब उन्हें स्वीकारा जाये।

तीसरा खतरनाक पहलू है सामाजिक विषमताओं की सच्चाई से मुंह मोड़ना। गुजरात में उपवास करने के बाद नरेन्द्र मोदी जी ने अपनी राजनैतिक समझ रखते हुए कहा कि एक बार अल्पसंख्यक आयोग ने उनसे पूछा कि गुजरात सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए क्या किया तो उन्होंने कहा कि गुजरात सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए कुछ नहीं किया तथा गुजरात सरकार ने बहुसंख्यकों के लिए भी कुछ नही किया। उन्होंने जो किया 6 करोड़ गुजरातियों के लिए किया। कमोबेश यही समझ वो देश के आम चुनाव में भी दे रहे हैं। पहली बार में यह बात बहुत आकर्षक लगती है। ये हमारी इच्छा हो सकती है पर यह सही नहीं। डा0 अम्बेडकर जी का इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कथन है कि असमानों के बीच समान व्यवहार से अधिक गलत कोई बात नहीं। समाज में मौजूद भेदभाव, चाहे वो जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि में किसी भी रूप में हो, तो राज्य को उसके खिलाफ कदम उठाकर समतामूलक समाज की स्थापना करनी होगी। इस प्रक्रिया में भेदभाव के शिकार लोगों के लिए विशेष कदम उठाना जातिवाद अथवा साम्प्रदायिकता नहीं बल्कि सामाजिक न्याय कहलाता है, जो संविधान का अभिन्न अंग है, जिसे स्वाधीनता संग्राम में शामिल कमोबेश सभी धाराओं का समर्थन प्राप्त था। इस प्रकार की राजनैतिक समझदारी का अर्थ है भारत में मौजूद सबसे बड़ी सच्चाई से इन्कार तथा चुनौतियों से मुंह मोड़ना।

और अंत में, जिस कारण से वह सर्वाधिक चर्चा में आये, जिस कारण उनका सर्वाधिक विरोध हुआ, उन्हें सबसे अधिक उपमायें दी गयीं, वो है गुजरात दंगे, जो इकलौता कारण ही पर्याप्त है मोदी जी को रोकने के लिए। गुजरात दंगों में नरेन्द्र मोदी जी की संलिप्तता संदिग्ध है। इन दंगों ने पहली बार ”राज्य प्रायोजित दंगों” की अवधारणा राजनीति को दी, जिसने 2004 के आम चुनाव में भाजपा को हराने में एक प्रमुख भूमिका निभायी। यदि ये मान भी लिया जाये कि दंगों में मोदी जी की संलिप्ता नहीं थी तो भी उन्होंने दंगों को ”क्रिया की प्रतिक्रिया” नाम दिया था। गुजरात में ही जन्में, साबरमती के सन्त, महात्मा गांधी से एक बार किसी हिन्दू ने पूछा कि उसके जवान बेटे को मुसलमानों ने मार डाला, उसे शांति कैसे मिले, तो गांधी जी ने कहा कि अपने बेटे के हम उम्र किसी मुसलमान लड़के को तलाशो जिसके मां बाप को हिन्दुओं ने मार दिया हो, और उसे बिना धर्मान्तरण किये गोद लो, तभी तुम्हें शांति मिलेगी। हम या तो गांधी जी के देश जोड़ने वाले दर्शन को अपना सकते हैं या मोदी जी के देश तोड़ने वाले दर्शन को। दंगों को क्रिया की प्रतिक्रिया बताने वाले मोदी जी को शायद ज्ञान नहीं कि संवैधानिक पद पर बैठे लोगों को सिर्फ दोषियों और निर्दोषों में फर्क करना होता है। गोधरा हो या उसके बाद के दंगे, घटना तो एक ही थी कि मजहबी चश्मे के अपराधियों ने निर्दोषों को मारा। दुर्भाग्य से वो मजहबी चश्मा मोदी जी ने भी पहन लिया।

मोदी जी का इतना विरोध दरअसल उस राजनैतिक दर्शन का विरोध है जो गांधी, अम्बेडकर तथा भगतसिंह के दर्शन के खिलाफ है और जो हिन्दुस्तान के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देता है।

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in