चीन के मुकाबले उच्च शिक्षा में पिछड़ते हम ?

2:35 pm or October 20, 2014
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– डाॅ. सुनील शर्मा –

खबर है कि चीन पिछले तीन दशकों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में प्रमुख योगदान कर्ता के रूप में सामने आया है।वैश्विक विज्ञान जगत में ज्ञान के बड़े स्त्रोत के रूप में उभार का संबंध केवल संख्या में ही नहीं बल्कि गुणवत्ता के लिहाज से भी काफी महत्तवपूर्ण है।शोध पत्रों के प्रकाशन के मामले मे भी चीन  काफी तेज गति से आगे बढ़ रहा है।सन् 1990 में हमारे देश में प्रकाशित शोध पत्रों की संख्या चीन के मुकाबले दोगूना थी लेकिन वर्ष 2011 आते आते चीन के मुकाबले प्रकाशनों का अनुपात घटते घटते 30 फीसदी से भी कम रह गया। स्पष्ट है कि शोधपत्रों का प्रकाशन और शोधकार्य सीधे तौर पर उच्चशिक्षा से जुड़ा मामला है जिसमें हम सीधे तौर पर काफी पिछड़ चुके है।चीन के इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की वही वजहें जो भारत के पिछड़ने की।चीन ने आर्थिक तरक्की के साथ साथ विश्वस्तरीय शिक्षकों एवं शिक्षा संस्थानों की मदद से उच्चशिक्षा में काफी सुधार किए हैं। चीन ने अपने विश्वविद्यालयों और अकादमिक संस्थाओं का स्वायत्यशासी स्वरूप मजबूत किया है,स्थानीय स्वशासन इकाईयों एवं नगरपालिक निगम जैसी संस्थाओं को विश्वविद्यालय प्रारंभ करने की जिम्मेदारी दी है ताकि उच्चशिक्षा का व्यापक प्रसार में निर्बाध हो सके। विदेशी शिक्षण संस्थानों में चीन की स्प्ष्ट नीति है कि उन्हें स्थानीय संस्थाओं से भागीदारी करनी पड़ती है ताकि चीनी संस्थान आसानी से उनकी अच्छाईयों को समझ सके। लेकिन भारत में इसके उलट है अभी भी विदेशी शिक्षण संस्थानों के प्रवेश के मामले में स्पष्ट नीति की दरकार है,हालात् ये कि मंत्री बदलते हैं सरकारें बदलती है विदेशी विवि के संबंध में नीतियाॅ बदल जाती हैं ।नकली और गुणवत्ता की लिहाज से घटिया माने जाने वाले विदेशी शिक्षण संस्थान यहाॅ केम्पस खोलते हैं और छात्रों से तकड़ी रकम हड़पकर अपने देश चले जाते है। चीन के मुकाबले देश में उच्च शिक्षा संस्थानों की भारी कमी है यूपीए सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने एक बार कहा था कि भारत में तत्काल नए 40 हजार कालेजों की आवश्यकता है। वर्तमान सरकार की मंत्री का रूख अभी तक सामने नहीं आया है संभवतः वो पहले  इस व्यवस्था को समझने की कोशिश में है?

हमारे देश में उच्च शिक्षा की व्यवस्था यूजीसी के हाथ में जो विश्वविद्यालयीन शिक्षा की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम का निर्धारण, शिक्षकों की योग्यता आदि को तय करती है। यूजीसी के कायदों के मुताबिक सरकारी संस्थान से संबंधित शिक्षकों की एक बार नियुक्ति बाद सारी जिंदगी सुकून से कटने की गारण्टी रहती है क्योंकि उनको तयशुदा समय में प्रमोशन, वेतन वृद्वि और रिटायरमेंट के बाद पेंशन मिलने की पूरी पूरी गारण्टी रहती है, अब वो बच्चों को पढ़ाएॅ तो उनकी नैतिकता? शोधपत्र लिखें तो उनकी रूचि? हालात् ऐसे हैं कि उच्चशिक्षा संस्थानों से जुड़े शिक्षक बाबुओं बदल चुके है। देश में उच्चशिक्षा समवर्ती सूची में है अतःविवि एवं महाविद्यालयीन शिक्षा की जिम्मेदारी राज्यों के हवाले है अतः राज्यसरकारंे और नौकरशाही इन्हें अपने हिसाब से फेंटते हैं। प्रदेशों में महाविद्यालयीन शिक्षा संस्थानों के हालात् बद से बदतर हो चुके  हैं,और सरकारें इन्हें हर हालत् में निजी पूॅजीपतियों के हवाले करने की जुगत में है! इस संदर्भ में म.प्र. के उच्चशिक्षा संस्थान और उनकी व्यवस्थाओं पर गौर करना सामयिक होगा।

जहाॅ हम अधिनायकवादी चीन की बात करते हैं तो वहाॅ उच्चशिक्षा के प्रशासन और नियमन के क्षेत्र में विकेन्दीकरण भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की तुलना में कहीं ज्यादा है और उच्चशिक्षा संस्थान अधिक स्वायत्य है। लेकिन हम म.प्र. के हालात् पर गौर करें तो यहाॅ पिछले छ माह के दौरान विवि की स्वायतता खत्म करनी की पूरी कवायद की गई है। और यहाॅ विश्वविद्यालय पूर्णत नौकरशाही के अधीन किए गए है। जो भविष्य में निश्चित तौर पर एक केन्द्रीय इकाई की भाॅति सारे विश्वविद्यालयो का संचालन करने स्वतंत्र होगें। यहाॅ महाविद्यालयों के हालात् बदतर हैं। इनमें पढ़ाने वाले शिक्षकों का सर्वथा अभाव है। शिक्षा जगत में सरकार द्वारा संचालित कालेजों को केवल परीक्षा सेंटर कहा जाता है जहाॅ छात्र प्रवेश लेते हैं और परीक्षा देने आते हैं क्योंकि पढ़ाने के लिए शिक्षक हैं ही नहीं और जो हैं वो बाबूगिरी में उलझे हैं अतः बीच में छात्र आने की जरूरत ही महसूस नहीं करते है। अभी एक अखबार की खबर के मुताबिक प्रदेश के सरकारी महाविद्यालयों में छात्र संख्या के लिहाज से कम से कम चालीस हजार शिक्षकों की आवश्यकता है। महाविद्यालय और विवि शोध की नर्सरी माने जाते हैं लेकिन जब इनमें न तो शिक्षकों और न ही शैक्षणिक गुणवत्ता तो चीन से ज्ञान के मुकाबले में लगातार पिछड़ा तय है। नौकरशाही हाबी होने के कारण यहाॅ का उच्चशिक्षा जगत भ्रष्टाचार से भी ग्रसित है अगर कोई शिक्षक रिसर्च करना चाहता है तो तो उसके प्रोजेक्ट में लगने वाले उपकरणों की खरीद नौकरशाही ही तय करेगी अगर अधिकारियों को उचित लगता है तो प्रोफेसर साहब को उपकरण मिल जाएॅगें अन्यथा नहीं। म.प्र. के एक महाविद्यालय के शिक्षक बतलाते हैं उनकी प्रयोगशाला में उपकरण नहीं हैं क्योंकि पिछले तीन सालों से लगातार कोशिश करने के बावजूद संचालनालय स्तर से अनुमति नहीं मिल पाई है। और जिसका सीधा सा कारण है वहाॅ के बाबुओं को संतुष्ट नहीं कर पाना। अब प्रयोगशाला में उपकरण नहीं है तो छात्र प्रयोग की पढ़ाई से बंचित रहेगें ही।

वास्तव में देश और प्रदेश में उच्चशिक्षा के हालात् अच्छे नहीं है। यहाॅ उच्चशिक्षा को पूंजी पतियों की कमाई के लिए तैयार किया जा रहा है। शिक्षा संस्थानों का केंन्द्रीयकरण कर स्वायत्ता को खत्म किया जा रहा है। शोध को बाबुओं के हवाले किया जा रहा है। शिक्षकों को नौकरशाही के नतमस्तक किया जा रहा है और छात्रों को सुविधाविहीन संस्थाओं के भरोसे छोड़ा जा रहा है। निश्चित तौर पर ये बातें उच्चशिक्षा के विकास के घातक सिद्व होने वाली है।

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