जो कुछ में कर रहा हूं यही मेरी योग्यता है

2:46 pm or October 20, 2014
kailash

– शैलेंद्र चैहान –

यह संभवतः सन 2005 की बात है, एक शाम मैं सहारा समय समाचार चैनल देख रहा था तो एक समाचार प्रसारित हुआ कि कैलाश सत्यार्थी का नाम नोबल पुरस्कार के प्रस्तावित हुआ है। मुझे इस  बात पर आश्चर्य हुआ। मैं तब मध्य प्रदेश के धार जिले में था वहां से मैंने इस बात की पुष्टि करनी चाही।

उन दिनों सहारा समय के विदिशा के पत्रकार बृजेन्द्र पांडे हुआ करते थे वहीं से यह समाचार लगा था।  बृजेंद्र पांडे, मेरे और कैलाश के सहपाठी थे सन 1967 -69 में विदिशा के हायर सेकण्डरी स्कूल में। बाद को कैलाश ने इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमीशन ले लिया, मैंने और बृजेंद्र ने बी एस सी में। मैंने उन्हें घेन लगाया और इस बाबत उनसे पूछा। उन्होंने बताया कि कई लोगों ने कैलाश का नाम प्रस्तावित किया था। नोबल पुरस्कार  लिए तब उन्हें नामांकित नहीं किया गया था। आज जब मैं बेटी से मिलने वैंकूवर पहुंचा तो उसने बताया कि आपके मित्र कैलाश सत्यार्थी अंकल को श्पीसश्  नोबल पुरस्कार मिला है। कुछ महीने पहले मैं मेरी पत्नी तथा बेटी कैलाश के अलवर जिले के आश्रम गए थे। वहां उनकी पत्नी तथा बेटी भी थी। आज यह समाचार सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ। मलाला युसुफजई के साथ सम्मिलित रूप से उन्हें 2014 का शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें बच्चों और युवाओं के दमन के खघ्लिाफ कार्य करने तथा सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए दिया गया है। कैलाश बंधुआ मजदूरी एवं बाल श्रम के विरुद्ध भारतीय अभियान में 1990 के दशक से ही सक्रिय रहे हैं, आंदोलन करते रहे हैं। कहा जाता है कि उनके द्वारा संचालित संगठन बचपन बचाओ आन्दोलन ने लगभग 80 हजार बाल श्रमिकों को मुक्त कराया है और उनके पुनर्वास एवं शिक्षा की व्यवस्था में सहायता की है। ह्यूमन राइट्स वॉच के द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार भारत में बाल यौन उत्पीड़न घरों, स्कूलों तथा आवासीय देखभाल केंद्रों मंे  आम बात है। दिल्ली बलात्कार कांड के बाद सरकार द्वारा कानूनी और नीतिगत सुधार सुझाने के लिए गठित की गई समिति ने पाया कि बाल सुरक्षा नीतियाँ “स्पष्ट रूप से उन लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं जिनका उन्होंने बीड़ा उठाया था।” भारत में बाल यौन उत्पीड़न से निपटने की प्रणाली और सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने में अपर्याप्त हैं। अनेक बच्चों को दोबारा दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ रहा है। उसका कारण है पीड़ादायक चिकित्सीय जाँच और पुलिस और अन्य अधिकारी जो या तो उनकी बात सुनना नहीं चाहते या फिर उन पर विश्वास नहीं करते। सरकारी तंत्र बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा पीडघ्तिों के साथ व्यवहार के मामलों को रोक पाने में विफल रहा है। यूं तो स्कूलों को बच्चों का वर्तमान व भविष्य गढ़ने का केन्द्र माना जाता है। लेकिन बीते कुछ सालों से स्कूलों के भीतर से बच्चों के शोषण और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाली शारारिक प्रताड़ना, यौन शोषण, दुव्र्यवहार हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। मौजूदा परिस्थितियां भी कुछ ऐसी हैं कि बच्चों के लिए हिंसामुक्त और भयमुक्त माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सवाल अब बहुत बघ सवाल बन चुका हैं। सस्ते श्रमिक,

बंधुआ मजदूर, बच्चों एवं महिलाओं की तस्करी और उनपर किये जाने वाले जुल्म बघ् रहे हैं। दिल्ली में छत्तीसगढ़ और झारखण्ड से घरों में काम करने वाले बच्चों को लाया जाता है और उनके साथ लगातार अन्याय किया जाता है। दिल्ली की हाल ही की घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। विकलांग बच्चों में उनके जीवन के जन्म पहले दिन से बहिष्कार शुरू हो जाता है। सरकारी मान्यता के अभाव में, उन्हे अपने अस्तित्व और संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक सेवाओं और कानूनी सुरक्षा से काट दिए जाता हैं। उनकी उपेक्षा ही भेदभाव बघती है। द स्टेट ऑफ द वर्ल्डस चिल्ड्रन’स 2013 चिल्ड्रन विथ डिसेबिलिटी  कहती है कि विकलांग बच्चों को स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने या स्कूल जाने की कम से कम संभावना होती है। वे हिंसा, उत्पीड़न, शोषण और उपेक्षा के सबसे बडी कमजोरी के बीच होते है खास कर जब अगर उन्हे छिपाया जाता है या संस्थानों में डाला जाता हैं – कई सामाजिक कलंक के कारण या उन्हें उठाने की खर्च के कारण। वे दुनिया में सबसे उपेक्षित लोगों के बीच में है। गरीबी में रहने वाले बच्चों को अपने स्थानीय स्कूल या क्लिनिक में कम से कम में भाग लेने की संभावना होती है, लेकिन जो गरीबी में रहते हैं और विकलांग भी हैं  उन लोगों में ऐसा कर पाने की संभावना कम होती है। कैलाश सत्यार्थी पिछले दो दशकों से वे बालश्रम के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और इस आंदोलन को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए जाने जाते हैं। हायर सेकंडरी तक कैलाश एक मेधावी छात्र थे। इंजीनियरिंग में प्रवेश के बाद उनका ढर्रा बदलने लगा। वह आर्य समाजी तो थे ही फिर लोहियावादी भी हो गए। जाति-पांति में कैलाश का विश्वास नहीं था। एक दिन विदिशा के नीमताल चैराहे पर कैलाश ने दलित अछूतों से भोजन बनवाया और बिना किसी की परवाह किये बीच चैराहे पर बैठ दलित बंधुओं के साथ हम लोगों ने भोजन किया। आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो उन्होंने समाजवादी दल के प्रत्याशी का दल बल के साथ प्रचार किया था। चुनाव के परिणाम आने के बाद कैलाश मुझे भोपाल के विधायक निवास ले गए और वहां तब निर्वाचित विधायक रघु ठाकुर से भेंट कराई थी। आर्य समाज तो उनका प्रथम प्रेम था जिसके चलते वह स्वामी अग्निवेश  संपर्क में आए और बंधुआ मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गए। यही उनकी इस क्षेत्र में पहली पाठशाला थी। बंधुआ बाल श्रमिकों को मुक्त कराना उनकी प्राथमिकता बन गई और पैशन भी। एक बार इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य ने उनसे पूछा था कैलाश तुम्हारी योग्यता क्या है तब कैलाश ने कहा था आप देख रहे हैं जो कुछ में कर रहा हूं यही मेरी योग्यता है। तब कैलाश की इस योग्यता पर शायद किसी को विश्वास न रहा हो लेकिन आज यह प्रमाणित हो गया है कि कैलाश की यह योग्यता किसी अकादमिक योग्यता से कहीं बड़ी थी।

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