’आखिर क्यों रही आतंकवाद पर चुप्पी’

3:29 pm or October 20, 2014
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– हरे राम मिश्र –

हाल ही में समाजवादी पार्टी का तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन लखनऊ में संपन्न हुआ। सम्मेलन में देश के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य, लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार की वजहों की समीक्षा, आगामी सामाजिक-राजनैतिक दिशा और सन् 2017 में उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भावी राजनीति की रूपरेखा तय किए गए। इस सम्मेलन में समाजवादी पार्टी ने सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने, देश में फासीवाद के बढ़ रहे खतरे, कथित पूंजीवाद के खिलाफ सड़क पर उतरने तथा मुसलमानों पर एक बार फिर से पकड़ मजबूत करने के तौर-तरीकों पर विचार-विमर्श किया। यह सब तो ठीक रहा लेकिन इस सम्मेलन में जो बात बेहद आश्चर्यजनक दिखी वह यह थी कि जो समाजवादी पार्टी कभी इस्लामी आतंकवाद और उससे निपटने के नाम पर मुस्लिम नौजवानों के पुलिसिया और खुफिया एजेंसियों द्वारा किए जा रहे सांप्रदायिक और अमानवीय उत्पीड़न पर बोल चुकी थी, एकदम चुप थी। इस सम्मेलन में इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर जिस तरह से चुप्पी साधे रखी गई, वह कई सवाल खड़े करती है। आखिर इस चुप्पी की क्या वजहें हैं? क्या समाजवादी पार्टी ने आतंकवाद के सवालों पर राजनीति से अब तौबा कर लिया है?

या फिर, क्या इसे महज एक इत्तेफाक ही समझा जाए कि कभी समाजवादी पार्टी के राजनैतिक एजेंडे में शामिल रहा आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों के उत्पीड़न और इंसाफ का सवाल, इस अधिवेशन के एजेंडे से असावधानीवश छूट गया? या फिर नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी के बाद बदले राजनैतिक और जमीनी हालातों में एक मजबूरी के तहत समाजवादी पार्टी ने इस विषय पर आगे राजनीति करने से किनारा कर लिया?

वैसे भी, किसी भी राजनैतिक दल का राष्ट्रीय एजेंडा और भावी रोड मैप एक दिन में तैयार नही किए जाते। यह महीनों की एक लंबी प्रक्रिया होती है। इसलिए यह मानना थोड़ा अस्वाभाविक है कि समाजवादी पार्टी के एजेंडे में आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों का उत्पीड़न और उनके इंसाफ का सवाल केवल असावधानीवश छूट गया होगा। इस तरह से अब यह स्पष्ट हो जाता है कि देश के बदलते राजनैतिक परिदृश्य में समाजवादी पार्टी ने आतंकवाद के नाम पर अब राजनीति करने से न केवल किनारा कर लिया है, बल्कि भविष्य में इस विषय का नाम लेना भी उसके राजनैतिक हितों के खिलाफ दिखाई पड़ने लगा है। समाजवादी पार्टी की इस चुप्पी के बाद अब यह सवाल जरूर पैदा होता है कि क्या यह मान लिया जाए कि भरतीय राजनैतिक परिदृश्य में आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए मुस्लिम नौजवानों के इंसाफ का सवाल कोई राजनैतिक मुद्दा नही रहा? क्या आतंकवाद से पीडि़तों के इंसाफ के सवाल पर इस देश में राजनीति नही हो सकती? यह सवाल इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है कि देश के राजनैतिक परिदृश्य में समाजवादी पार्टी ही एक ऐसी इकलौती पार्टी थी जिसने आतंकवाद पर राजनैतिक दलों की साम्राज्यवादी मीडिया द्वारा प्रचारित ’प्रचलित धारा’ के खिलाफ जाते हुए अपने चुनावी घोषणापत्र में पहली बार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि देश में आतंकवाद से निपटने के नाम पर बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को सांप्रदायिक जेहेनियत की पुलिस और खुफियातंत्र द्वारा न केवल फंसाया जाता है, बल्कि हिरासत में उनका घोर अमानवीय उत्पीड़न भी किया जाता है। इस मुद्दे से इतनी जल्दी वह पीछे क्यों हट गई?

अगर इस मुद्दे से समाजवादी पार्टी के किनारे हटने की असल वजहों पर नजर डालें तो लग सकता है कि समाजवादी पार्टी ने आतंकवाद के ’अमरीका प्रचारित’ नजरिए जो कि मुसलमानों और इस्लाम की एक ’दानवी’ छवि प्रस्तुत करता है, तथा संघ की मुस्लिम तुष्टीकरण के अफवाह भरे दुष्प्रचार का राजनैतिक नुकसान उठाया जाना एक तरह से स्वीकार कर लिया है। वह इस नुकसान की भरपाई का सबसे आसान और सुरक्षित तरीका इस मुद्दे से किनारा करना ही मान रही है। क्योंकि वह अपनी क्षमताएं जानती है।

 लेकिन, ऐसी नौबत क्यों आ गई? आखिर समाजवादी पार्टी अपने वोटरों को इस मुद्दे पर एकजुट रख पाने में नाकाम क्यों रही? अगर लोकसभा चुनाव में पिछड़ा वोटर संघ के ’दुष्प्रचार’ में बहक कर समाजवादी पार्टी के साथ नही खड़ा हुआ तो कम से कम मुस्लिम वोटरों को तो साथ देना चाहिए था, लेकिन वे भी समाजवादी पार्टी के साथ नही आए। आखिर क्यों?

 दरअसल आतंकवाद पर राजनीति करते हुए समाजवादी पार्टी ने मुसलमानों से केवल वादा खिलाफी की। विधानसभा चुनाव में बेगुनाहों को छोड़ने का वादा वह आज तक पूरा नही कर सकी। यह काम आसान भी नही था। क्योंकि ऐसा करना राज्य मशीनरी के सांप्रदायिक फासीवाद से एक पूरे वर्ग को मुक्त कराना होता जो कि खुद व्यवस्था के लिए भी खतरनाक होता। इस सवाल पर समाजवादी पार्टी को अपनी व्यवस्थागत सीमाओं का अंदाजा भी शायद पहली बार हुआ। इस स्थिति ने मुसलमानों में असंतोष को जन्म दिया और उन्होंने समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ दिया।

 इधर, संघ और अन्य हिन्दुत्ववादी गुटों ने साम्राज्यवादी मीडिया के मार्फत इस्लामी आतंकवाद पर समाजवादी पार्टी द्वारा तुष्टीकरण और पोषण की राजनीति करने का आरोप लगाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को और तेज किया गया। संघी हिन्दुत्व के इस सम्लित प्रचार में समाजवादी पार्टी अपने परंपरागत वोट बैंक के एक बड़े हिस्से को जातिवादी अस्मिता ’पिछड़ा वर्ग का प्रधानमंत्री’ बनाने की राजनीति के नाम पर तेजी से खो चुकी थी। लोक सभा के आम चुनावों में ’आतंकवादियों’ के रिहा किए जाने के सवाल को भाजपा ने जोर शोर से उठाया था। यह भी हिन्दुत्व और उसकी उपजातियों के एकीकरण में सहायक हुआ। इस स्थिति ने समाजवादी पार्टी की पूरी जमीन का खात्मा करने में अहम भूमिका अदा की। समाजवादी पार्टी इस सवाल में अपने हाथ जला चुकी थी। यह सब मुलायम सिंह के ’कथित’ सेक्यूलरिज्म पर पर संघ की निर्णायक विजय थी। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने इस सवाल को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

वैसे भी इस स्थिति के लिए समाजवादी पार्टी ही जिम्मेदार है। यह होना ही था। आप जिस विश्व बिरादरी का हिस्सा हैं वहां आतंकवाद का सवाल इस तरीके से हल ही नही किया जा सकता। यह एक लंबी प्रक्रिया होगी। किसी मुलायम सिंह यादव या फिर अखिलेश यादव के वश की बात नही है कि वह आतंकवाद के नाम पर पकड़े गए मुस्लिम नौजवान को बेगुनाह बताते हुए रिहा करने की हिमाकत करें। आतंकवाद का सवाल आज वैश्विक राजनीति का हिस्सा है जो तेल संसाधनों पर कब्जे से लेकर हथियारों के कारोबार के इर्द-गिर्द घूमता है। आतंकवाद अमरीकी साम्राज्यवादी राजनीति का सबसे अहम बिंदु है। भारत भी उसी राजनीति का हिस्सा है। अच्छा हुआ कि मुलायम को अपनी सीमाएं समझ में आ गईं। अब मुलायम के पीछे हटने के साथ ही इस सवाल पर आम जनता की गोलबंदी का वक्त आ चुका है। बिना उसके गोलबंद हुए आतंकवाद का हौव्वा मिटने वाला नही है। आतंकवाद का खात्मा अमरीकी साम्राज्यवाद के खात्मे के बगैर हो ही नही सकता। इसके लिए आम जन की ’वर्ग’ गोलबंदी ही एक उपाय है।

 

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