संदर्भ-: सर्वोच्च न्यायालय ने पंढरपुर के विठोवा मंदिर में दलित एवं महिला को दिया पूजा का अधिकार। दलितों को मिला मंदिर में पूजा का अधिकार

11:29 am or May 19, 2014
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प्रमोद भार्गव-

हाराष्ट्र के 900 साल पुराने पंढरपुर के विठोवा मंदिर में अब निचली जाति के पुरूष एवं महिला पुरोहित पूजा कर सकेंगे। दलितों को यह अधिकार सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है विट्ठल रूक्मिाणी मंदिर न्यास के अध्यक्ष अन्ना डेंगे ने इस आदेश पर खुशी जाहिर करते हुए बताया कि यह मंदिरों में पूजा और धार्मिक कार में ब्रह्मणों के प्रभुत्व को समाप्त करने की दृष्टि से ऐतिहासिक फैसला है। अब पूजा और धार्मिक कार सभी जातियों विशेषकर गैर-ब्राह्मण जातियों के लोग कर सकेगें। इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने ही तिरूपति मंदिर में अछूत, दलित और आदिवासियों को मंदिर में दर्शन का अधिकार देकर अह्म पहल की थी। अब अदालत का ताजा फैसला इस कड़ी में अभिनंदनीय पहल है।

सनातनी हिंदुओं द्वारा अपने ही समाज के एक बड़े हिस्से को भिन्न व अस्पृदश्य वर्ग बना देना हिंदु धर्म के माथे पर सदियों से चला आ रहा एक ऐसा कंलक था, जो धोए नहीं धुल रहा था। पंढरपुर और तिरूपति मंदिर के द्वार पर दलितों का स्वागत हिंदू समाज में कमावेश परंपरा बन चुकी रूढ़िवादिता ,छूआछूत और जातिवाद को समाप्त कर देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा। क्योंकि दलितों के हित साध्य के हेतुओं में राजनीतिक स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा सामाजिक समानता और समरसता का महत्व है। यह पहल उनमें गरिमा बढ़एगी, वे जतिगत हीनता बोधा से मुक्त होंगे, फलस्वरूप उनका आत्मबल भी प्रबल होगा। गोया, यह सम्मान उनका हिंदुओं की मुख्यधारा का हिस्सा बन जाने की दिशा भी सुनिश्चित करेगा। इस पहल से धर्मांतरण पर भी अंकुश लगेगा।

गांधी ने अपने एक भाषण में कहा था ‘अछूतों को एक जुदा वर्ग बना देना हिंदू धर्म के माथे पर कलंक है। यह अस्पृश्यता रूपी राक्षसी तो रवण से भी ज्यादा भयंकर है और जब हम इस राक्षसी की पूजा करते हैं, तब तो हमारे पाप की गुरूता और बढ़ जाती है। यदि इसे धर्म कहें तो ऐसे धर्म से तो मुझे घृणा होती है। यह हिंदू धर्म हो ही नहीं सकता। मैंने तो हिंदू धर्म द्वारा ईसाई और इस्लाम धर्म का आदर करना सीखा है,फिर यह पाप हिंदू धर्म का अंग कैसे हो सकता है ? इस पाखंड और अज्ञान के खिलाफ यदि जरूरत पड़े तो मैं अकेला लड़ुंगा, अकेला तपश्चर्या करूगां और उसका नाम जपते हुए मरूंगा।’ गांधी ने धर्म के पाखंड से जुड़ी कुरीतियों पर जितना मुखर हमला बोलकर सामाजिक समरसता के प्रयास किए थे उतने प्रयास स्वंतत्रता प्राप्ती के बाद किसी अन्य नेता नहीं किए। गांधी ने अपने अस्पृदश्यता विरोधी अभियान को केवल वैचारिक स्तर तक ही सीमित न रखते हुए इसे व्यावहारिक भी बनाया। यही नहीं 1920 में जब गांधी ने अंग्रेजी- राज के विरूध्द असहयोग आंदोलन की शुरूआत की तो इसके सामांतर ही अस्पृदश्यता उन्मूलन मुहिम को देशव्यापी जागरूकता अभियान के रूप में भी गतिशीलता प्रदान की।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की नामचीन सवर्ण जातियों ने धार्मिक कर्मकाण्ड और पाखंड की कपोल कल्पित पृष्ठभूमि के आधार पर जन्म की प्राकृतिक देन के साथ भेदभाव और छूआछूत की संकीर्णता का बीजारोपण किया हुआ है। जिसके कारण कृषि,लघु व हस्त शिल्प उद्योगों में उत्पादन से जुड़ी एक बड़ी आबादी को दलित व अछूत का दर्जा देकर सदियों से बहिष्कृत किया हुआ है। इन शर्मनाक व निंदनीय हालातों को बदलने की शुरूआत आजादी के समय से ही की जा रही थी। इसलीए इन जातियों के सामाजिक,राजनीतिक और प्रशासनिक उत्थान को दृष्टिगत रखते हुए इन वंचितों को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में आरक्षण के समुचित संवैधानिक प्रावधान रखे गए थे। मंडल आयोग के मार्फत उच्च प्रशासनिक पदों में भी उत्पीड़ितों को आरक्षण के अधिकार मिलें। आरक्षण का लाभ उठाकर लाखों लोग धर्म और जाति की बिना पर बहिष्कृत प्रतिष्ठापूर्ण राजनीतिक व प्रशासनिक पदों की शोभा बने,लेकिन इनमें से ज्यादतार प्रगतिशील रास्ता अपनाने की बजाय उस ब्राहम्णवाद के अनुयायी हो गए जिस ब्राहम्णवाद के पाखंड के चलते यह बहुसंख्यक समाज उपेक्षित था। दलित सरोकरों की बात तो दूर की कौड़ी रही, जो लोग आरक्षण के बूते अधिकार और आर्थिक समृध्दि के सोपान चढ़े थे, उनमें से अधिसंख्य अपने समाज से भी कटते चले गए। विडबंना तो इस हद तक थी कि जब क्रीमीलेयर के बहाने आरक्षण प्राप्त कर चुके लोगों के बच्चों को आरक्षण्ा से मुक्त रखने की बात उठने लगी तो यह तबका आरक्षण के लाभ को छोड़ने तैयार नहीं हुआ। इससे यह तय हुआ कि अपने ही जातीय समूहों के कल्याण हेतु व्यक्तिगत लाभ और आरक्षण के अवसर की कोई आहुति देना नहीं चाहता। लिहाजा जो कमजोर तबका सवर्ण जातियों की उलाहना झेलता चला आ रहा था, वह अपने ही समाज की उपेक्षा झेलने को भी विवश हो गया। यही नहीं अरक्षण के अवसर का लाभ पाए इन वंचित समुदायों ने उच्च और निम्न जातियों के बीच कमोवेश ठीक वैसे ही विभाजक रेखा खींच दी है, जो जन्म के आधार पर सदियों से सवर्ण और अवर्ण के बीच खिंची चली आ रही थी।

ऐसे विषम हालातों में पंढरपुर के भगवान विट्ठल मंदिर में अवर्णों के लिए दरवाजे खोलना हिंदूत्व को बड़े स्तर पर पुनर्जीवीत करना भी है। मंदिर में पूजा और पुरोहिताई की सदियों से चली आ रही हिंदू धर्म की वह सामाजिक रूढ़िवादिता भी खत्म होगी,जो समाज में असमानता और छुआछूत को बढ़ावा देती चली आ रही थी। अब धार्मिक अनुष्ठानों व कर्मकाण्डों में दलित, पिछड़े व आदिवासी वैदिक विधि- विधान से पूजा अर्चना कर सकें इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित भी किया जाएगा। यह पहल हिंदू समाज में भिन्न धर्म उपधर्म और जाति उपजातियों के कारण जो भेदभाव और बिखराव फैला हुआ है उसे कम करेगी। इससे समाज में एकता स्थापित होगी और एकता स्थापित होती है तो राष्टीय अखण्डता भी मजबूत होगी। वैसे भी हमारा संविधान अनेक नागरिक अधिकारों के साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता की भी गांरटी देता है। धार्मिक स्वंतत्रता का अधिकार बाधित होने के कारण ही खासकर दलित हिंदूओं में धर्म परिवर्तन की भावना का उत्स यदा-कदा फूट पड़ता था,उस पर विराम लगेगा। हिंदू जातियों व उप-जातियों के बीच परस्पर आत्मविश्वास का सबंल पैदा होगा। क्योंकि यह एक विचित्र विडंबना ही थी कि धर्म के अनुयायी होने के बावजूद गैर ब्राहम्ण मंदिरों में पूजा व पुरोहीताई से वंचित थे।

हालांकि कुछ जातीय समूहों को दलित, आदिवासी और पिछड़ी बना दिए जाने के कारण ऐतिहासिक भी रहे हैं। लेकिन हिंदू हित चिंतको ने अवैज्ञानिक व अविवश्सनीय इन मिथकों को तोड़ने की कोशिश कभी नहीं की, क्योंकि यही अंधाविश्वास उनकी प्रतिष्ठा का आधार था। कर्मकाण्ड का अंधाविश्वासी यहीं अनुष्ठान उनकी जीवीकोपार्जन का साधय भी था। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद देश में गृहयुध्द के जो हालात उपजे और विदेशी आक्राताओं के सिलसिलेवार जो हमले हुए उस उथल-पुथल में धर्म के निष्ठावान अनुयायी श्रीहीन हुए। फलस्वरूप धर्म के वाहक ऐसे लोग बन बैठे, जिन्होंने आक्रांताओं के समक्ष घुटने टेक दिए। नतीजतन यथास्थितिवाद के शिकार पंडे-पाखंडियों ने वैदिक कालीन वर्ण-व्यवस्था के सामाजिक विचार को जन्म के अलौकिक चमत्कार और विधि के विधान से जोड़कर रूढ़िवादी दुर्बल पराजय में ढाल दिया। अलौकिक चमत्कार की अवधारणओं ने देश को परतंत्र बना देने में भी अहम भूमिका निभाई। जब महमूद गजनबी यवन आक्रमणियों के साथ सोमनाथ के प्रसिध्द शिव मंदिर पर चढ़ाई कर रहा था तो मंदिर के पंडे-पुजारियों ने प्रतिकार के लिए तैयार खड़े लोगों को भरोसा जताया कि भोले शंकर तीसरा नेत्र खोलेंगे और देखते-देखते यवन सेना भस्म हो जाएगी। लेकिन चमत्कारवादी अलौकिक अवधारणाओं के क्या फलित निकले यह इतिहास के पन्नों पर शर्मनाक दास्तावेजों के रूप में दर्ज है। दैवीय शक्तियों के भ्रामक विचार ने दुर्बल मानसिकता को जन्म दिया और राजे-रजवाड़े व स्वतंत्र जनपदों में बंटे देश के सत्ताधारी घुटने टेकते चले गए। इस उथल-पुथल में जिन योध्दा समूहों ने पराजय नहीं मानी और अपने धर्म व अस्तित्व को बचाए रखने के लिए भटकते रहे, इनमें से भी कई जातीय समूह शैक्षिक व आर्थिक बदहाली के चलते दरिद्र जातियों के समूहों में तब्दील होते चले गए।

स्वतंत्र भारत में हैरानी की बात यह रही कि राजनीतिक स्तर पर भी वैज्ञानिक तरीके से जातीय अवधारणा की पड़ताल नहीं की गई। हां,जातीयता और सांप्रदायिकता को वोट की राजनीति के चलते भुनाया जरूर जाता रहा। सामाजिक न्याय के पैरोकारों ने तो मंडल के बहाने जातिवाद को घृणा की हद तक पहुंचाने का काम ब्राम्हणवाद की तरह किया। बावजूद इसके ऐसा नहीं है कि जातिवाद के विरूध्द दृष्टि व्यापाक न हुई हो, छूआछूत का भेद और दालित का अपमान आज दंडनीय अपराधा के दायरे में है। बहरहाल अब समय आ गया है कि अवसर का लाभ उठाते हुए हिंदु हित चिंतक दरिद्रनारायण कहे जाने वाले सभी हिंदुओं के लिए शेष रहे मंदिरों के द्वार खोल दें और आदर के साथ उन्हें प्रवेश, पूजा, पूजारी एवं पुरोहिताई का अवसर दें। क्योंकि सवर्ण हिंदुओं के व्यापक हित दरिद्र को नारायण बना देने के व्यापक हितों में ही अंतर्निहित व सुरक्षित हैं।

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