मातृभाषा की मानसिकता से उबरें

11:38 am or May 19, 2014
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शशिमान शुक्ला-

शिक्षा के माध्यम को लेकर अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने स्पष्ट कहा है कि राज्य सरकारें भाषाई अल्पसंख्यक शिक्षक संस्थानों में क्षेत्रीय भाषाओं को नहीं थोप सकतीं। अदालत का यह फैसला अत्यन्त महत्वपूर्ण है और इसका दिल खोलकर स्वागत किया जाना चाहिए। यह फैसला कर्नाटक सरकार द्वारा सन 1994 में बनाये गये उस कानून पर विचार करते हुए सुनाया गया है, जिसके अनुसार कर्नाटक की समस्त प्राथमिक पाठशालाओं के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया था कि पहली कक्षा से लेकर पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को शिक्षा मातृभाषा कन्नड़ में दी जाए। अगर प्राथमिक विद्यालय किसी अन्य भाषा को बच्चों की पढ़ाई का माध्यम बनाएंगे तो उनकी मान्यता रद्द कर दी जाएगी। इस कानून के चलते अन्य राज्यों से आए विद्यार्थियों को तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सही मायनों में इस फैसले का बच्चों के विकास पर दूरगामी असर होगा। देश की भाषायी विविधता बच्चों के नैसर्गिक विकास में आड़े आती है। उन्हे कदम कदम पर भाषायी विविधता से जूझना पडता है। घर में कोई भाषा बोली जाती है, फिर बाहर निकलते हैं तो राष्ट्रीय भाषा प्रयोग में आने लगती हैं। फिर निजी स्कूलों में अंग्रेजी का बोलबाला होता है। ऐसे में विद्यार्थियों की सारी ऊर्जा भाषायी अवरोधा से जूझने में खर्च हो जाती है। दिक्कत यह है कि देश के नीति निर्माता अभी तक ऐसा कोई कारगर रास्ता नहीं निकाल पाये है जिसके सहारे भाषायी विविधाता से उत्पन्न होने वाली परेशानियों से निबटा जा सके। भाषायी नियम नहीं निश्चित कर पाए हैं जो इस बहुभाषी देश में स्वीकार्य हो और जिसका खामियाजा बच्चों को न भुगतना पड़े। भाषायी विविधता एक जटिल समस्या है और इसके समाधान के लिए गंभीर पहल की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिक शिक्षा के माध्यम को लेकर जो फैसला दिया है इससे भाषा की राजनीति करने वालों को जरूर ठेस पहुंचेगी। कोर्ट ने कहा है कि छात्रों पर उनकी मातृभाषा थोपना गलत है। बच्चे किस माध्यम में पढ़ेंगे, यह फैसला अभिभावकों पर छोड़ दिया जाए, इसमें राज्य दखल न दे। कोर्ट ने कहा है कि आज की तारीख में अंग्रेजी की अनदेखी नहीं की जा सकती है। जब बच्चे अपनी मातृभाषा में पढ़कर रोजगार के लिए दर दर की ठोकरे खाते रहें तो फिर ऐसी षिक्षा से लाभ ही क्या है। मातृभाषा के पैरोकारों को ऐसी टिप्पणियां चुभती हैं, मगर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शिक्षा के बारे में एक आम धारणा है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में ज्यादा सहजता से सीखते हैं। मगर यह भी देखना चाहिए कि शिक्षा का मकसद अंतत: मनुष्य को अपने समाज के अनुकूल बनाना है। ऐसी शिक्षा का क्या फायदा जो हमें समाज में अलग-थलग और पिछड़ा बना दे। भूमंडलीकरण और सूचना क्रांति के इस दौर में अंग्रेजी ने दुनिया में नए सिरे से अपना महत्व कायम किया है। आज यह विश्व बिरादरी के बीच संवाद का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। अगर हम आधुनिक दुनिया के साथ चलना चाहते हैं और तरक्की हासिल करना चाहते हैं तो अंग्रेजी को अपनाना होगा। देश के एक तबके ने इस बात को समय रहते समझा और अंग्रेजी के सहारे समृध्दि हासिल की। लेकिन आज भी देश का एक बड़ा वर्ग अंग्रेजी की शिक्षा से वंचित है। इन लोगो का मानना है कि ‘अंग्रेजी का षिक्षा का माध्यम बनाने से देश के करोड़ों बच्चों की प्रतिभा का गला घुट जायेगा। षिक्षा के निजीकरण को बढावा मिलेगा और अभिभावकों की जेब काटी जायेगी। यह जानते हुए कि छोटे बच्चों के लिए विदेशी भाषा के माधयम से किसी विषय को पढ़ना बेहद कठिन होता है। उससे उनकी बुध्दि और मौलिकता कुंद हो जाती है। उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। इसके बावजूद अंग्रेजी को पढ़ाई के माध्यम के तौर पर अनिवार्य करना क्या भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है? अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रावधान की जो व्याख्या कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने की वह समस्याग्रस्त है। इस स्वतंत्रता के तहत बच्चे की अपनी पसंद की भाषा में शिक्षा पाने की स्वतंत्रता भी शामिल है। सरकार सिर्फ इसलिए उसकी ये स्वतंत्रता नियंत्रित नहीं कर सकती कि उसकी राय में मातृभाषा में पढ़ाना ही बच्चे के लिए लाभदायक है। इस व्याख्या को आगे बढ़ाते हुए कोर्ट ने कहा कि बच्चे या उसकी तरफ से उसके अभिभावक को शिक्षा का माधयम चुनने की आजादी है। जो देश अंग्रेजी के प्रति दासता के भाव से आज तक नहीं उबर पाया हो, उसमें ये आजादी कैसे विदेशी भाषा की श्रेष्ठता एवं वर्चस्व को स्वीकार किए रहने की स्वैच्छिक गुलामी में बदल जाती है, न्यायाधीश संभवत: इस संदर्भ पर धयान नहीं दे पाए। यह गुलामी करोड़ों बच्चों की नैसर्गिक प्रतिभा को कुंठित करने के लिए जिम्मेदार है। दुनिया में तमाम विकसित देश वो हैं, जिन्होंने अपनी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया। मगर अपने यहां अगर कभी किसी राज्य सरकार ने ऐसी पहल की, तो अभिजात्य वर्ग ने अपने रसूख से उसे कामयाब नहीं होने दिया। नतीजा, अवसरों की बढ़ती गैर-बराबरी है। विडंबना पर गौर कीजिए। कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि विशेषज्ञ इस पर एकमत हैं कि सिर्फ मातृभाषा में ही प्राथमिक शिक्षा बेहतर ढंग से पाई जा सकती है। इसके बावजूद उसने ऐसी व्यवस्था दी, जिससे अनगितन अध्ययनों एवं अनुसंधनों से उभरी ये राय निरर्थक हो जाती है। अत: इस फैसले को न्यायिक चुनौती दी जानी चाहिए।’ सच तो यह है कि भाषा को लेकर हमारे अधिकतर नेता और बुध्दिजीवी अपनी दुविधा से उबर नहीं सके हैं। वे अपनी भाषा को लेकर प्राय: भावुक रहते हैं और उसे अपनी जातीय अस्मिता से जोड़कर देखते हैं। वे जानते हैं कि बदले हुए समय में अपनी मातृभाषा का अध्ययन भावनात्मक संतोष तो दे सकता है पर रोजी-रोजगार नहीं दिला सकता। लेकिन इस बात को सीधे-सीधे स्वीकार करने का उनके पास साहस नहीं है। उनका यही संशय अकसर कुछ राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों और सरकारी फैसलों में दिखता रहता है। अपनी व्यावहारिक जरूरतों के लिए किसी भाषा को अपनाना अपनी मातृभाषा या संस्कृति से कट जाना नहीं है। रोजी-रोजगार के लिए अंग्रेजी पढ़ते हुए भी हम अपनी भाषा और सांस्कृतिक मूल्यों से गहरे अर्थों में जुड़े रह सकते हैं। इस मामले में चीन का उदाहरण सामने है, जहां अंग्रेजी सीखने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है। अब बात इस पर होनी चाहिए कि कैसे अंग्रेजी शिक्षा सस्ती और सर्वसुलभ बने ताकि यह समाज के हर वर्ग तक पहुंच सके।

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