कब तक वोट बैंक बने रहेंगें मुसलमान ?

12:04 pm or May 19, 2014
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जावेद अनीस-

देश में चुनावी नगाड़ा बजते ही मुस्लिम समुदाय राजनीति के केंद्र में आ जाता है, सियासी पार्टियाँ इस सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के असली हितेषी होने का दम भरने लगती हैं। इस दौरान मुसलमानों के सामने एक तरफ तो वो सियासी जमातें होती है जो उनके हक में काम करने का दावे करते नहीं थकतीं तो दूसरी तरफ दक्षिणपंथी जमातें होती हैं जो उनके तुष्टिकरण का आरोप लगाती हैं।

इस दौरान कुल मिलकर सारी बहस ”चुनावी धर्मनिरपेक्षता” पर आकर टिक जाती है, इसे ”चुनावी धर्मनिरपेक्षता” इसलिए कहेंगें क्योंकि आजाद भारत में मुसलमान चुनाव दर चुनाव धर्मनिरपेक्षता और खुद के सुरक्षा के नाम पर लगभग हर पार्टी को आजमा चूका है लेकिन इसके बदले में उसे ना तो सुरक्षा मिली और ना ही तरक्की।

दरअसल खुद को मुसलमानों के हितेषी होने का दावा करने वाली सियासी पार्टियों ने इन्हें कभी ”वोट बैक” से ज्यादा कुछ नहीं समझा हैं इसलिए उनकी तरफ से इस समुदाय के उत्थान और विकास के लिए गम्भीर प्रयास दिखाई नहीं देते है। मुस्लिम समुदाय के वास्तविक मुद्दे और समस्याएँ कभी उनके एजेंडे में रहे ही नहीं , इसके बदले उनकी सारी कवायद दक्षिणपंथी ताकतों का डर दिखाकर कर मुस्लिम वोट हासिल करने तक ही सीमित रही है। गौर करने की बात यह है कि साम्प्रदायिकता को लेकर तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की लड़ाई ना केवल नकली साबित हो रही है बल्कि कभीदृकभी इनका ”दक्षिणपंथी ताकतों” के साथ का अघोषित रिश्ता भी नजर आता है, यहाँ तक कि ये एक दूसरे को बनाये रखने में मदद भी करती नजर आती हैं ताकि देश के दोनों प्रमुख समुदायों को एक दूसरे का भय दिखा कर अपनी रोटी सेंकी जाती रहे।

इधर इस समुदाय की बुनियादी समस्याएँ जस की तस बनी हुई हैं। नवंबर, 2006 में सच्चर कमेटी द्वारा जारी रिपोर्ट ने बताया था कि प्रमुख मानव विकास सूचकांकों में मुस्लिम समुदाय काफी पीछे है, न सिर्फ उनकी आर्थिक-शैक्षणिक स्थिति दयनीय है बल्कि वे व्यापार और रोजगार के मामले में भी काफी पीछे हैं। सरकारी नौकरियों में भी इस समुदाय की भागीदारी, उनकी आबादी की तुलना में काफी कम है। सच्चर समिति ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी स्वीकार किया कि कई मामलों में मुसलमानों को भेदभाव का शिकार भी होना पड़ता है ।

अगर मुस्लिम समुदाय के बीच शिक्षा के स्थिति का जायजा लें तो, 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में हाई स्कूल स्तर पर मुसलमानों की उपस्थित दर 7.2 प्रतिशत है, जबकि महाविद्यालयों में यह दर मात्र 6.5 प्रतिशत है। अप्रेल 2013 में भारत सरकार के मानव विकास संसाधन मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट ”Standing Committee of the National Monitoring Committee for Minorities* Educationß (NMCME) के अनुसार उच्च शिक्षा में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व 11 प्रतिशत है, जबकि हिन्दू और ईसाई समुदाय में यह अनुपात क्रमश: 20 तथा 31 प्रतिशत है। इसके नतीजे में हम पाते हैं कि मुसलमानों का केन्द्र व राज्य के सरकारी नौकरीयों में प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है, निजी क्षेत्र में भी कमोबेश यही स्थिति है।

मुस्लिम समुदाय में गरीबी का स्तर देखे तो जून 2013 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एन.एस.एस.ओ.) द्वारा ”भारत के बड़े धार्मिक समूहों में रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति” नाम से जारी रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न धार्मिक समुदायों में मुसलमानों का जीवन स्तर सबसे नीचे है और वे रोज औसतन महज 32.66 रुपये (प्रति व्यक्ति) में जीवन गुजारते हैं। इसी तरह से मार्च 2012 में गरीबी को लेकर योजना आयोग द्वारा किये गये आकंलन के अनुसार शहरी भारत का हर तीसरा मुस्लमान गरीब है।

स्वास्थ और पोषण की स्थिति भी ठीक नहीं है। नेशनल फैमली हैल्थ सर्वे -3 के अनुसार मुस्लिम समुदाय में शिशु मृत्यु दर 52.4 प्रतिशत है, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 57 प्रतिशत है।

”आक्सफेम” द्वारा जारी रिर्पोट दृ”सहस्राब्द्वी विकास लक्ष्य और मुस्लिमस आफॅ इंडिया 2013” के अनुसार देश में लगभग 50 प्रतिशत मुस्लिम परिवारों में अलग से शौचालय की व्यवस्था नही है। इसी तरह से केवल 36 प्रतिशत मुस्लिम परिवारों में ही नल के पानी की व्यवस्था है जो कि राष्ट्रीय औसत से 4 प्रतिशत कम है।

सुरक्षा देश के प्रत्येक नागरिक का बुनियादी अधिकार है। किसी भी बहुधार्मिक मुल्क में धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित वहां के अल्पसंख्यक होते हैं। तमाम वायदों के बावजूद सियासी दल दंगों को रोकने में नाकाम रहे हैं। अगस्त 2013 में केन्द्र सरकार द्वारा संसद में दी गयी जानकारी के अनुसार       साल 2009 से 2013 (मार्च तक) के बीच देश में कुल 2969 सांप्रदायिक घटनायें हुई है जिसमें कुल 442 जानें गयी हैं और 9,228 नागरिक घायल हुए हैं। सबसे ज्यादा दंगे उत्तारप्रदेश (482 ) में हुए हैं,जबकि महराष्ट्र (454 घटनायें ) दूसरे नम्बर पर हैं, वहीँ तीसरे,चौथे और पांचवे नम्बर पर क्रमश: मध्य प्रदेश (432 घटनायें ), कर्नाटक (332 घटनायें )और गुजरात (246 घटनायें ) हैं। स्पष्ट है कि, साम्प्रदायिक दंगों पर रोक लगाने को लेकर सेक्युलर और कम्युनल जमातों का ”ट्रैक रिकॉर्ड” समान है।

इस तरह से हम देखते हैं कि तमाम हवाई वायदों और ”तुष्टिकरण” के आरोपों के बीच मुस्लिम समुदाय की जमीनी यथार्थ कुछ और है। इसे इस समुदाय का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि, देश की तमाम सियासी पार्टियों का जोर या तो इनकी असुरक्षा की भावना को भुना कर उन्हें महज एक वोट बैंक के रूप इस्तेमाल करने की है या फिर उनके नागरिक अधिकारों को स्थगित करके उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बना देने की है ।

किसी भी लोकतान्त्रिक देश के विकास का पैमाना यह है कि वह अपने अल्पसंख्यकों के साथ किस तरह का सलूक करता है, जिस देश का एक बड़ा तबका पिछड़ेपन और असुरक्षा के भावना के साथ जी रहा हो वह इस पैमाने पर खरा नहीं उतर सकता है, हिंदुस्तान की जम्हूरियत की मजबूती के लिए एक तरफ यह जरूरी हैं कि अकलियतों में असुरक्षा की भावना को बढ़ाने भुनाने और ”तुष्टिकरण” के आरोपों की राजनीति बंद हो और उनकी समस्याओं को राजनीति के एजेंडे पर लाया जाए,सच्चर और रंगनाथ मिश्र कमेटी के रिपोर्टो की अनुसंशाओं पर खुले दिल से अमल हो, समुदाय में बैठी असुरक्षा की भावना को खत्म करने के लिए मजबूत कानून बने जो सांप्रदायिक घटनाओं पर काबू पाने और दोषियों के विरूध्द कार्रवाई करने में सक्षम हो। वही दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय को भी भावनात्मक मुद्दों के बहकावे में आना बंद करना होगा और उन्हें अपनी वास्तविक समस्यायों को हल करने के लिए राजनीति को एक औजार के तौर पर इस्तेमाल करना सीखना होगा । यह काम मजहबी लीडरान से पिंड छुड़ाकर उनकी जगह नये सामाजिक- राजनीतिक नेतृत्व पैदा किये बिना नहीं किया जा सकता है।

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