खतरों भरी है पाकिस्तान में पत्रकारिता

12:33 pm or May 19, 2014
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-एल.एस.हरदेनिया-

भी हाल में पाकिस्तान के एक अत्यधिक प्रभावशाली और प्रसिध्द पत्रकार हामिद मीर पर कातिलाना हमला हुआ था। यह पहली बार नहीं है कि पाकिस्तान के किसी पत्रकार पर कातिलाना हमला हुआ हो। पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पताका लहराना काफी कठिन काम है। कभी-कभी इस पताका को लहराते हुए पाकिस्तान के पत्रकारों को अपनी जान से तक हाथ धोना पड़ता है। हमले के बाद हामिद मीर ने एक लंबा लेख लिखा है। इस लेख में उन्होंने पाकिस्तान में पत्रकारिता की स्थिति पर विस्तृत प्रकाश डाला है। वे अपने लेख में कहते हैं कि पाकिस्तान में एक अजीब स्थिति है। पाकिस्तान में जब भी कोई पत्रकार, लेखक या बुध्दिजीवी कोई ऐसी बात कहता है जो वहां की सेना और गुप्तचर एजेन्सी आई.एस.आई. को पसंद नहीं आती है, तो वे उस पत्रकार, लेखक या बुध्दिजीवी पर गद्दार होने का आरोप लगाते हैं। पाकिस्तान के संविधान में यह प्रावधान है कि जब भी कोई व्यक्ति अपने आचरण या शक्ति का उपयोग कर संविधान विरोधी काम करता है, तो उसे देशद्रोही माना जायगा। परन्तु चार सैनिक तानाशाहों ने, जिन्होंने संविधान को अपने पैरों तले रौंद कर सत्ता हथियाई और पाकिस्तान पर शासन किया, उन्हें किसी ने देशद्रोही या गद्दार नहीं कहा। परन्तु जब भी किसी नागरिक ने किसी अन्याय के विरूध्द आवाज उठाई, उसे तुरंत गद्दार या देशद्रोही बता दिया गया। 2013 के दिसंबर माह में इतिहास ने एक नई करवट ली। चौथे सैनिक तानाशाह परवेज मुशर्रफ के विरूध्द औपचारिक रूप से गद्दारी का आरोप लगाते हुए अदालत में मुकदमा चलाया गया।

हामिद मीर लिखते हैं कि उन्होंने टेलीविजन पर और अखबारों में प्रकाशित उनके लेखों में स्पष्ट रूप से कहा कि मुशर्रफ पर गद्दारी का मुकदमा चलाया जाना चाहिए और किसी भी हालत में उन्हें पाकिस्तान छोड़ने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। परन्तु इसी वर्ष 19 अप्रैल को मुझ पर कातिलाना हमला कर मुझे भी उस श्रेणी में डाल दिया गया, जिसमें मुशर्रफ को रहना चाहिए। ऐसा परवेज मुशर्रफ के उन समर्थकों ने किया है जो पाकिस्तान की गुप्तचर एजेन्सी में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं। ”मुझे इसलिए गद्दार कहा गया क्योंकि मैंने बलूचिस्तान के उन लोगों के पक्षों में आवाज उठाई जिनका अपहरण कर लिया गया और जिनको तरह-तरह की यंत्रणाएं दी गईं और जिनमें से कुछ लोगों को मार दिया गया। यह जघन्य कार्य सेक्युरिटी फोर्स के लोगों ने किया है। यह अफसोस की बात है कि पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने मेरे समेत अनेक पत्रकारों के विरूध्द एक याचिका विचारार्थ स्वीकार कर ली है। याचिका में मांग की गई है कि मेरे और अन्य पत्रकारों के विरूध्द मुकदमा चलाया जाए। याचिका में यह आरोप लगाया गया है कि हम लोगों ने सेना की प्रतिष्ठा पर आघात किया है।

”इस घटना से कुछ पुरानी बातें याद आती हैं। मेरे पिता वारिस मीर ने पूर्वी पाकिस्तान में सेना की जन विरोधी गतिविधियों पर आपत्ति की थी। शायद पाक सेना की आपत्तिजनक गतिविधियों के कारण पूर्वी पाकिस्तान, पाकिस्तान से अलग हो गया। मेरे पिता को भी गद्दार कहा गया था। मेरे पिता भी पत्रकार, लेखक और बुध्दिजीवी थे। इसके अतिरिक्त वे लाहौर के पंजाब विश्वविद्यालय में मास कम्यूनिकेशन विभाग में प्रोफेसर थे। परन्तु मृत्यु के बाद मेरे पिता के योगदान के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश की सरकारों ने उन्हें सबसे बड़ा सम्मान दिया था। यह सम्मान मृत्योपरांत दिया गया था। यह प्रसन्नता की बात है कि जिस तरह उस समय लेखकों, कवियों और बुध्दिजीवियों ने मेरे पिता को समर्थन दिया था, वैसे ही मुझे भी बुध्दिजीवियों और मानव अधिकारों के प्रति प्रतिबध्द लोगों का समर्थन मिल रहा है।

”जब मुझे गद्दार निरूपित किया गया तो मैंने स्वयं से यह सवाल पूछा कि ”क्या मैं सच में गद्दार हूँ ? पाकिस्तान के खाकी वर्दी के ये लोग बिना किसी हिचकिचाहट के अपने विरोधियों को गद्दार कहने में क्षण भर की देर नहीं करते हैं। उन्होंने पाकिस्तान के निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना को भी गद्दार की पदवी दे दी थी। जब लोकतंत्र का गला घोटते हुए जनरल अयूब खान ने सत्ता हथियाई थी तो फातिमा जिन्ना ने उसके विरूध्द अपनी आवाज बुलंद की थी। जब फातिमा जिन्ना ने अयूब के विरूध्द प्रेसीडेन्ट का चुनाव लड़ने की घोषणा की तो उन्हें भारत का एजेन्ट बता दिया गया। 49 वर्ष के बाद अब पाकिस्तान में लोकतंत्रात्मक सरकार तो है परन्तु आज भी अनेक मामलों में चुनी हुई सरकार और उच्च अदालतें अपने को निस्सहाय महसूस करती हैं।

”सच बात तो यह है कि मीडिया को अपनी आजाद भूमिका के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। डेढ़ सौ से ज्यादा पत्रकार पिछले कुछ वर्षों में मारे जा चुके हैं। अनेक पत्रकारों का अपहरण कर लिया गया है। अपहरण के बाद उन्हें नाना प्रकार की यंत्रणा दी गई और अंतत: उनकी हत्या कर दी गई है। मैं ऐसे अनेक पत्रकारों को जानता हूँ जिन्होंने या तो पत्रकारिता का व्यवसाय छोड़ दिया है या वे उस शहर से पलायन कर गए हैं जिसमें वे रहते थे। मैं उन पत्रकारों को भी जानता हूं जिन्होंने दबाव के बावजूद पत्रकारिता से नाता नहीं तोड़ा परन्तु बाद में उनकी हत्या कर दी गई। हिंसात्मक हमले की धामकी देकर एक तरह की सेंसर थोपी जाती है। कुछ दिन पूर्व, दो टेलीविजन पत्रकारों हयातुल्लाह खान और स्वात मूसा खान खेल ने मुझे सूचित किया था कि किसी भी दिन उनकी हत्या हो सकती है। मैंने यह बात सार्वजनिक की। परन्तु इसके बावजूद उन्हें नहीं बचाया जा सका।

”हमें इस बात का एहसास है कि हमारी चुनी हुई सरकार कमजोर है और हमारा लोकतंत्र भी मजबूत नहीं है। इसके बावजूद हम सच बोलने की प्रतिबध्दता को कभी नहीं छोड़ेंगे। हमारी राय में सच बोलना, राष्ट्रहित के ऊपर है और ज्यादा महत्वपूर्ण है। हमें इस बात का भी एहसास है कि पाकिस्तान, दुनिया का सबसे ज्यादा खतरों से भरा देश है और पाकिस्तान में पत्रकारिता करना सर्वाधिक जोखिम से भरपूर प्रोफेशन है। और हमें उम्मीद है कि एक दिन हम तानाशाही, आतंकवादी और अतिवादी ताकतों को शिकस्त देने में सफल होंगे। शर्त यह है कि हम सच कहने की अपनी जिद पर अड़े रहें। हम जानते हैं कि आने वाली पीढ़ियां तथाकथित देश हित के नाम पर इस तरह की घटिया तानाशाही को नहीं सहेंगे और सच का गला नहीं घोंटने देंगे।”

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