प्रदूषण की भी राजधानी बनी दिल्ली

2:06 pm or May 26, 2014
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-सुनील तिवारी-

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दिल्ली दुनिया का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर है। 91 देशों के 1600 शहरों में कराए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई है। ‘ऐम्बिएंट एयर पल्यूशन’ नामक इस रिपोर्ट के 2014 के संस्करण में 91 देशों के करीब 1600 शहरों में वायु प्रदूषण की स्थिति का ब्योरा दिया गया है। प्रदूषित हवा के मामले में दिल्ली देश का सबसे दूषित राज्य है। एशिया के अन्य सघन आबादी वाले शहरों में भी दिल्ली से कम वायु प्रदूषण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से साफ है कि अगर जल्द ही दिल्ली में प्रदूषण को कम करने के उपाय नहीं किए गए तो आने वाले दिनों में बीमारियों में इजाफा हो सकता है। हालांकि यह बात भी गौर करने वाली है कि गत 16 सालों में दिल्ली का हरित क्षेत्र 1.75 से बढ़कर 20.2 फीसद हो गया है। हरियाली भले ही बढ़ गई हो, लेकिन वाहनों, खासकर पुराने वाहनों से होने वाले प्रदूषण की समस्या यहां अधिक है। इससे शीघ्र निपटने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे। दिल्ली की सड़कों पर 70 लाख वाहन प्रतिदिन दौड़ते हैं। इन वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएं के कारण दिल्लीवासियों को तरह-तरह की बीमारियां अपने आगोश में ले रही हैं। दिल्ली में यात्रियों की तुलना में बसों की संख्या काफी कम है। इससे निजी वाहन बढ़ रहे हैं। यदि सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को मजबूत नहीं बनाया गया तो आने वाले दिनों में हालात बेकाबू हो जाएंगे। केंद्रीय विज्ञान व तकनीकी मंत्रालय द्वारा कराए गए एक अधययन के अनुसार बीते एक दशक में राजधानी के वायु प्रदूषण के स्तर में 21 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। सरकार मानती है कि राजधानी में 70 फीसद वायु प्रदूषण वाहनों की वजह से हो रहा है। दिल्ली में सार्वजनिक वाहनों में सीएनजी के इस्तेमाल ने साल 1996 की तुलना में वर्ष 2003-04 में राजधानी में वायु प्रदूषण के स्तर को 24 फीसद तक घटा दिया था, लेकिन 2007 के बाद प्रदूषण का स्तर फिर से बढ़ने लगा। दिल्ली के प्रदूषण को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन की यह रिपोर्ट निश्चित ही गहरी चिंता का विषय है। प्रदूषण की समस्या का व्यावहारिक समाधान खोजना होगा और उसे सिर्फ सरकार के भरोसे न छोड़कर जन सहभागिता के आधार पर अमलीजामा पहनाना होगा। अधिक से अधिक वृक्षारोपण पर ध्यान देना होगा। पर्यावरण को सबसे बड़ा खतरा तेजी से कटते जा रहे पेड़ों से है। जब वृक्ष ही नहीं रहेंगे तो पर्यावरण भी नहीं बचेगा। इसलिए दिल्ली में प्रतिदिन बढ़ रहे प्रदूषण की रोकथाम बेहद जरूरी है। इसमें देरी तन, मन और धान तीनों के लिए नुकसानदेह साबित होगी। अगर इस तथ्य पर गौर करें कि 2012 में अकेले वायु-प्रदूषण के कारण दुनियाभर में 70 लाख लोगों ने जान गंवायी, तो दिल्ली की सवा करोड़ आबादी की आसन्न नियति का अंदाजा लगाया जा सकता है। बात सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 20 सर्वाधिक वायु-प्रदूषित शहरों में से 13 भारत के हैं और दिल्ली के बाद सर्वाधिक वायु-प्रदूषण वाला दूसरा शहर पटना है। तीसरे और चौथे नंबर पर ग्वालियर व रायपुर हैं। डब्ल्यूएचओ इस निष्कर्ष पर मूल्यांकन में मनमानी करके नहीं पहुंचा है, कि उस पर विकासशील दक्षिण एशियाई शहरों की छवि को धाूमिल करने का आरोप मढ़ा जाये। सर्वेक्षण के लिए वांछित जानकारी शहरों ने ही प्रदान की थी। आम चुनाव के बीच जारी हुई यह रिपोर्ट देश में विकास के सरकारी दावों की पोल खोलती है। विकास के बूते देश की तकदीर बदलने का दावा करनेवाली पार्टियों के मेनिफेस्टो पर्यावरण और प्रदूषण के सवाल पर आश्चर्यजनक ढंग से मौन हैं। दुनिया के सर्वाधिक वायु प्रदूषित शहरों की सूची में पहले चार स्थानों पर भारतीय शहरों का होना प्रमाण है कि शहरीकरण के नाम पर विश्वस्तरीय सुविधाओं के सपने दिखानेवाली विकास नीतियां पर्यावरण की संरक्षा के भाव से कोसों दूर हैं।

इस मसले पर सिलसिलेवार विचार किया जाना चाहिए। पहली बात तो यह है कि दिल्ली महानगर का प्रदूषण कोई ऐसी समस्या नहीं है जो अचानक आई प्राकतिक आपदा या मानवीय त्रासदी हो। सच यह है कि यह पिछले तीन दशक से तेज हुई है, विशेषकर मोटर गाडियों की तादात के ब जहां तक दिल्ली में मोटरगाडियों का सवाल है वह खासा जटिल है। इसमें शंका नहीं है कि महानगर में इस समय गाडियों की संख्या 70 लाख पहुंच गई है। इसमें से 60 प्रतिशत गाडियां डीजल चालित हैं। डीजल की गाडियां पेट्रोल और गैस से चलनेवाली गाडियों से ज्यादा प्रदूषण फैलाती हैं। दस वर्ष पहले दिल्ली में बड़े पैमाने पर बसों और अन्य व्यापारिक गाडियों में सीएनजी (कंप्रैस्ड नेचुरल गैस) अनिवार्य कर दी गई थी। सस्ती होने के कारण इसे अन्य निजी गाडियों ने भी बड़े पैमाने पर अपनाया। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इससे प्रदूषण के स्तर में सन 2001 से 2005 के दौरान थोड़ी कमी हुई। पर इसके बाद यह फिर से बढने लगा और गत वर्ष तो यह देश के औसत मानदंड के अनुसार चार गुना और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंडों के मुताबिक 13 गुना ज्यादा था। सीएनजी ने निश्चय ही महानगर के प्रदूषण को कुछ हद तक कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई पर यह कमी कोई बड़ी कमी नहीं थी। निश्चय ही अगर शहर के प्रदूषण को नियंत्रित करना है तो गाडियों की संख्या को सीमित करना होगा। इसके अलावा गाडियों से निकलनेवाली गर्मी और धुंए को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम भी उठाने होंगे। इनमें भविष्य में सिर्फ उन्हीं कंपनियों को गाडियों के उत्पादन की इजाजत देना भी है जो कि वैकल्पिक ऊर्जा के अलावा ऐसी उच्च तकनीक का इस्तेमाल करती हों जो कम से कम ईंधान पर चलती हों। जहां तक वाहनों को कम करने का सवाल है उसके कई तरीके हो सकते हैं। पहला, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना और दूसरा निजी वाहनों की खरीद को हतोत्साहित करना है। इसके लिए निजी गाडियों पर करों को बढ़ाने के साथ नयी गाडियों की खरीद को सीमित करना भी है। इसका एक तरीका वह हो सकता है जो बीजिंग में अपनाया जा रहा है कि एक वर्ष में एक निश्चित संख्या से ज्यादा लोगों को गाड़ी खरीदने की इजाजत न देना।

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