इन संकेतों को समझें सपा-बसपा-काँग्रेस

3:21 pm or May 26, 2014
260520145

सुनील अमर-

लोकसभा का यह चुनाव परिवर्तनकामी रहा, ऐसा चुनाव नतीजों से साफ हो चुका है। देश के अधिसंख्य मतदाताओं ने परिवारवाद, वंशवाद और राजनीतिक तानाशाही के विरुध्द परिवर्तन को अपनी सहमति दी है। इससे स्पष्ट ही यह संकेत निकले हैं कि हमारा लोकतंत्र और परिपक्व हुआ है तथा आम मतदाता जाति और धर्म की खोल से बाहर निकला है। परिवर्तन लोकतंत्र का स्थायी चरित्र है। पिछले लोकसभा चुनावों के बरक्स यह चुनाव इसलिए भी भिन्न रहा है कि इसमें सर्वाधिक समय तक चुनाव प्रचार किए गए लेकिन आश्चर्य इस बात का है इतने लम्बे समय के दौरान भी दशकों का अनुभव रखने वाले पत्रकार और लम्बे राजनीतिक जीवन वाले राजनेता तक यह समझ नहीं सके कि मतदाता का मिजाज किस तरह बदल रहा है! जो राजनीतिक दल भारी बहुमत से सत्ता में आया है वह और उसे चुनाव लड़ाने वाली उसकी मातृसंस्था तक को वोटों की बारिश का यह अंदाजा नहीं था। इसलिए अगर यह कहा जाय कि मतदाताओं के मिजाज को भाँपने में सभी लोग असफल रहे तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

उत्तर प्रदेश के चार प्रमुख राजनीतिक दलों में से तीन लगभग साफ हो गए हैं। दलित चेतना को झंकृत करके उनकी जातीय अस्मिता को जगाने वाली बहुजन समाज पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया था लेकिन इस बार वह खाता तक नहीं खोल सकी है। समाजवादी पार्टी तथा भारतीय राष्ट्रीय कॉग्रेस के सर्वेसर्वा लोग अपना चुनाव जरुर जीत गए हैं लेकिन उनसे इतर उनका एक भी प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पाया है। इसके संकेत बहुत मारक हैं और उम्मीद कम ही है कि इन पार्टियों के प्रमुख इतने मारक संकेतों को ग्रहण कर तदनुरुप कोई परिवर्तन करना चाहेंगें। सपा और बसपा की स्थापना ही जातिगत वोटों को लेकर हुई थी, बिल्कुल उसी तरह जैसे भारतीय जनता पार्टी धर्म की राजनीति करती है और कांग्रेस सर्वसमावेशी की। लेकिन कमाल देखिए कि, इस चुनाव में भाजपा ने हिन्दू कट्टरता की बात को दरकिनार कर विकास और सुशासन की बात की तो उसकी झोली में सभी जाति-धर्म के वोटों की बरसात हो गई और सपा-बसपा अपने स्थायी जातिगत दुराग्रह पर अड़े रहे तो उनका सूपड़ा साफ हो गया! वोटों के इस जोड़, घटाव और गुणा, भाग की ऑधी में कांग्रेस का सर्वसमावेशी तम्बू उड़ गया।

तो क्या अब ये उम्मीद की जाय कि इस चुनाव से नसीहत लेते हुए सपा प्रमुख मुलायम सिंह अपने मुसलमान और यादव वोटबैंक तथा बसपा प्रमुख मायावती दलित वोटबैंक की खोल से बाहर निकल कर कुछ ऐसा करेंगें कि उनके साथ सभी जाति,धर्म और उम्र के लोग जुड़ सकें? होना तो यही चाहिए क्योंकि सवा अरब आबादी वाला यह देश खुद में सर्वसमावेशी चरित्र का ही है लेकिन ऐसा करने से पहले वे कॉग्रेस नामक सर्वसमावेशी चरित्र वाले एक वयोवृध्द राजनीतिक दल की दुर्दशा को देख ही रहे होंगें। सपा-बसपा तो ऐसा करना भी नहीं चाहेंगें क्योंकि तब उनकी अन्य दलों के मुकाबले बनी एक भिन्न पहचान मिट जाएगी। इसलिए ज्यादा संभावना इसी बात की है कि ये अपने मौजूदा लटकों-झटकों के साथ ही मतदाताओं को भरमाने के नये आयाम गढ़ेंगें और अगर भाजपा की अपनी चलने पाएगी तो वह भी वैसा ही करेगी जैसा अब तक करती आई है। इस बार का चुनाव भाजपा नहीं लड़ी है। भाजपा के चुनाव चिह्न कमल तथा अपने खुद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी नामक छाते को लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ चुनाव लड़ा है। इससे फर्क यह हुआ कि हमारे घिसे-पिटे अनाकर्षक हो चुके चुनाव में एक ताजगी और नयापन आ गया तथा भाजपा के तमाम आगी-दागी-हतभागी लोग इस छाते के नीचे दुबक कर वैतरणी पार कर गए! यही काम सपा-बसपा-काँग्रेस नहीं कर सकीं। मुलायम सिंह के पास वही जाना-सुना उनका चेहरा और वही दशकों पुराना मुसलमानों को डराकर अपने पाले में खड़ा करने का फार्मूला तो बसपा के पास वही जानी-पहचानी-आजमाई हुई मायावती बहन और उनका दलित आधार। कॉग्रेस को यह मुगालता कि मोदी का भय अपने आप में इतना पर्याप्त होगा कि सारे भयभीत वोट उसकी झोली में आ गिरेंगें।

इस चुनाव का संकेत देखिए कि जो भय पैदा करने के लिए कुख्यात रहा है उसने भाईचारे और विकास के नाम पर वोट की उम्मीद की और जो भाईचारे और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए जाने जाते रहे हैं उन्हें भयभीत लोगों के समर्थन की उम्मीद रही! लेकिन लोग भयभीत हुए ही नहीं और खेल बिगड़ गया। सपा-बसपा को जाति की राजनीति ने धोखा दे दिया। बसपा और काँग्रेस को उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश में हुए दंगों से मुसलमान सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी से नाराज हुआ है और वह प्रतिक्रिया में उनकी झोली में आ जाएगा। ऐसा हुआ तो लेकिन अपेक्षा से बहुत कम। ज्यादातर मुस्लिम वोट भाजपा प्रत्याशियों को हराने के लिए उनके विरुध्द हुए लेकिन इस बॅटवारे ने भाजपा की राह आसान कर दी। बसपा और कांग्रेस का चुनाव प्रचार भी भाजपा के मुकाबले आक्रामक नहीं हो पाया। यह पहली बार था कि बहन मायावती चुनाव के दौरान इतनी निष्क्रिय रही हों। भाजपा का चुनाव अभियान आक्रामक था तो बसपा निहायत निपटाऊ ढ़र्रे पर थी। हो सकता है कि बसपा प्रमुख के दिमाग यह रहा हो कि कांग्रेस के दस वर्षों के शासन से ऊबे लोग, सपा सरकार की दंगों और प्रशासनिक मोर्चों पर विफलता तथा भाजपा की तरफ से मोदी का हौव्वा, यह सारे फैक्टर मिलाकर उनकी राह आसान कर देंगें और वे ज्यादा नहीं तो पिछले चुनाव जितनी सीटें तो पा ही जाएंगीं। लेकिन सरकार से हटने के बाद अपने बंगलों से बाहर न निकलने तथा चाटुकारों से घिरे रहने की उनकी आदत ने उन्हें मोदी की आंधी का अनुमान लगने ही नहीं दिया। यही कांग्रेस के साथ भी हुआ। उसे भी हद से ज्यादा मोदी के खौफ का लाभ मिलने की उम्मीद थी।

सपा-बसपा और कांग्रेस, मतदाताओं का यह रुझान पढ़ पाने में असमर्थ रहे कि लोग परम्परागत राजनीति के लम्बे-चौड़े, झूठे वादे और पेट भराऊ विकास योजनाओं के एकदम त्रस्त हो चुके हैं। संभवत: यह भाजपा को पता नहीं था लेकिन एक विदेशी प्रचार एजेन्सी और संघ के रणनीतिकारों ने सर्वथा नया प्रयोग कर उस पर दाँव लगाया। गुनाहों के दलदल और आंतरिक मारकाट में संलिप्त पार्टी से महज चुनाव चिह्न लिया और केन्द्रीय राजनीति के लिए एक सर्वथा नये चेहरे को आगे कर जल-थल-नभ की लड़ाई को छेड़ दिया। भाजपा और उसके राजनीतिक कुकर्म नेपथ्य में चले गए। पुरानी शराब नयी बोतल में भर दी गई। यह सवाल यह है कि क्या यह सब कुछ देखने जानने के बावजूद क्या सपा-बसपा और कांग्रेस में ऐसा किया जाना संभव है? क्या ऐसा लगता है कि वहाँ दशकों से जड़ें जमाए लोगों को उसी तरह नेपथ्य में किया जा सकता है जैसे भाजपा में आडवाणी, सुषमा, जोशी, यशवंत सिन्हा और विनय कटियार सरीखे वरिष्ठों को किया गया? इन तीनों दलों में भी क्या किसी क्षेत्रीय नेता को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया जा सकता है? शायद नहीं। इन दलों में हार के कारणों पर मंथन चल रहा है। कुछ निर्बल लोग इधर-उधर या बलि के बकरे बनाए जा सकते हैं लेकिन फिर वही बादशाही व्यवस्था चल निकलेगी। हंसी आती यह जानकर कि समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह सिर्फ अपनी बहू और भतीजों को ही जिता पाये हैं लेकिन वे सारे प्रत्याशियों की क्लास लेकर हड़का रहे हैं कि वे लोग हारे क्यों! उस तानाशाही पार्टी में किसी में यह पूछने का साहस नहीं है कि आप परिवार के अलावा किसी एक बंदे को भी क्यों नहीं जिता पाए।

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